क्या चुनाब आयोग की हिदायत प्रजा तंत्र के लिए सही है

मुख्य चुनाब आयुक्त की यह हिदायत की उच्च पदों पर बैठे नेताओं को संबैधानिक संस्थाओं पर सोच समघ कर टिपण्णी करनी चाहिए!चुनाब आयोग को भी यह सोचना चाहिये की उसका मुख्य मंत्री मायावती तथा उनके चुनाब चिन्ह हाथी की मूर्तियों को ढकने का निर्णय आम जनता से लेकर बहुजन समाज पार्टी तथा उसकी बिपछी पार्टियाँ भी पचा नहीं पा रहीं हैं ! चुनाब आयोग को यह समझना चाहिए की उनका मूर्तियों को ठकने का निर्णय अपने उद्देश्य पर नहीं पहुँच पाया है तथा ये मूर्तियाँ ढकी होने के बाबजूद अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहीं हैं तथा इससे बसपा का मुफ्त मैं प्रचार हो गया एवम ये निर्णय निश्चित रूप से जल्दबाजी मैं लिया गया निर्णय प्रतीत होता है इसके लिए बसपा ने बिपछी पार्टियों का शुक्रिया अदा भी किया.
लेकिन ये बात समझ मैं नहीं आई की इस फैसले से यदि बसपा को राजनितिक फायदा हुआ था तो उसने इसका बिरोध ही नहीं बल्कि इसे जातीबादी , दलित बिरोधी ,और केंद्र सरकार के इशारे पर किया हुआ निर्णय क्यों करार दिया ! बसपा तथा किसी भी राजनैतिक दल को किसी संबैधानिक संस्था का इस तरह बिरोध नहीं करना चाहिए की उसे इससे राजनैतिक लाभ मिले बल्कि उसे इस निर्णय के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहिए !चुनाब आयोग का इस निर्णय के पीछे का यह तर्क नि:संदेह ठीक लगता है की मायावती तथा हाथियों की मूर्तियों को ढकने का निर्णय इसलिए लिया गया क्योंकि ये सरकारी पैसे का उपयोग करके सरकारी जमींन पर किया गया है लेकिन चुनाब आयोग को यह भी पता होना चाहिए की इस प्रकार के कितने ही भवन तथा संस्थान जो किसी दल से सम्बंधित है का निर्माण सरकारी जमींन पर है ! चुनाब आयोग को इस पर कोई ठोस नीती बनानी चाहिए बरना आने बाले समय मैं उनकी परेशानियां बढने बालीं हैं.